Sunday, February 27, 2011
असली सम्पत्ति
वह रोज लोकल ट्रेन से दफ्तर जाता था. सहयात्रियों में आज “जीवन की असली सम्पत्ति” विषय पर बहस शुरु हो चुकी थी. “भैया जीवन की असली सम्पत्ति तो पैसा ही है. बाकी सब मन को बहलाने की बातें हैं.” पहला तर्क देकर खिड़की से बाहर देखने लगा. “पैसा नहीं आदमी की सेहत ही असली पूंजी है.रुपया है पर सेहत खराब है तो उसे वह चाटेगा क्या ?” दूसरे का तर्क अलग था. “मैं जीवन में रुपया तो नहीं जोड़ पाया पर मैने बच्चों को पढ़ा लिखा के काबिल बना दिया. अब वही मेरी सम्पत्ति हैं.पैसा हो पर बच्चे आवारा घूम रहे हों तो ऐसा पैसा किस काम का” एक अन्य यात्री बोल पड़ा़. “अजी छोड़िये जनाब वही बच्चे आपको कितना पूछ रहे हैं हमें सब पता है. ये बीवी बच्चे सब मिथ्या है. अगले जनम के लिये असली धन है भगवान का ध्यान.” “खाली भगवान भजन से कुछ नहीं होता चाचा करम भी अच्छे होने चाहिये” एक युवा यात्री ने बात काटते हुये कहा. “अच्छे कर्मों का फल जरूर मिलता है, चाहे इस जनम में चाहे अगले जनम में.” बहस अब चरम पर थी.” अजी अगला जनम किसने देखा है जनाब. कर्मो का फल मिला है किसी को आजतक ? ये कलयुग है. यहाँ अच्छे करम करने वाले ही सबसे ज्यादा दुख उठाते हैं. आदमी के पास बुढ़ापे में एक मकान हो और हो ढेर सा पैसा फिर चाहे वह अच्छे कर्मों से कमाया हो या बुरे कर्मों से क्या फर्क पड़ता है ?” बहस वहीं पर आ गयी जहाँ से शुरु हुई थी. स्टेशन भी आ गया था. सब के साथ वह भी उतर गया. वह जीवन में कई बार इस तरह की बहस का साक्षी रहा था पर लोग कभी एकमत नहीं होते थे. आज वह रिटायर हो रहा है. वह भी और लोगों की तरह जीवन की असली सम्पत्ति हासिल कर लेना चाहता है पर उसे पता तो चले कि जीवन की असली सम्पत्ति आखिर है क्या.
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"वह भी और लोगों की तरह जीवन की असली सम्पत्ति हासिल कर लेना चाहता है पर उसे पता तो चले कि जीवन की असली सम्पत्ति आखिर है क्या"
ReplyDeleteशुक्रिया।
ReplyDeleteइस नए सुंदर से चिट्ठे के साथ आपका हिंदी ब्लॉग जगत में स्वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!
ReplyDeleteआप सभी महानुभावों का मैं बहुत आभारी हूं. धन्यवाद.
ReplyDeleteउमेश मोहन धवन