“बेटा टीवी जरा धीमे कर दो. बल्कि मैं तो कहता हूं कि बंद ही कर दो. तुम्हें पता नहीं अभी परसों ही पड़ोस वाले सक्सेना अंकल का निधन हुआ है. अभी चौथा भी नहीं हुआ है. आवाज बाहर तक जाती है, अच्छा नहीं लगता.” सुभाष ने पास आकर अपने बीस वर्षीय बेटे मनीष को समझाने का प्रयास किया. “अरे पापा कितना इंपार्टेंट मैच आ रहा है. और आज मेरी छुट्टी भी है. उन्हें मरे दो दिन हो गये हैं न. अब कितने दिन शोक मनाया जायेगा.” मनीष ने बिना गर्दन घुमाये जवाब दिया. “पर बेटा आवाज बंद करके भी तो मैच देख सकते हो. तुम तो जानते ही हो कि वे मेरे कितने अच्छे मित्र थे. हमारा रोज का उठना बैठना था ” सुभाष ने एक बार फिर प्रयास किया. “अरे पापा आप भी किस सदी की बात कर रहे हैं. इस देश में तो कितने लोग रोज मर रहे हैं. तो क्या हम रोज टीवी न देखें. वैसे भी कोई अपने घर का थोड़े ही मरा है. फिर हम क्यों इतना शोक मनायें.” बेटे की नजरें अब भी टीवी से हटी नहीं थीं. सुभाष का मन हुआ कि खुद ही टीवी बंद कर दे पर बेटे के तेवर देख ऐसा कर न सका. उसके तर्क सुन वह और कुछ तो नहीं कह सका बस केवल इतना ही बोल पाया “ बेटे यदि तुम इसी मानसिकता पर चलते जाओगे तो देखना एक दिन अपने बाप का शोक भी नहीं मनाओगे.”
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