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Sunday, December 4, 2011

रचनाकार: उमेश मोहन धवन की लघुकथाएँ

रचनाकार: उमेश मोहन धवन की लघुकथाएँ
Posted by Umesh Mohan Dhawan at 10:22 AM No comments:
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एक और सिद्धार्थ

एक और सिद्धार्थ



“ इतना दिन हो गया आपको दवा कराते, कुच्छो फायदा तो हो नहीं रहा है. कही गिरह उरह का चक्कर तो नहीं है. न हो तो एक बार पंडिज्जी से मिल लीजिये. कोई उपाय बता देंगे.” बीमारी से काफी दिनों से परेशान चल रहे सदानंद बाबू पत्नी की सलाह मानकर सुबह ही पंडित जी के घर जा पहुँचे. “ आजकल आपके ग्रह कुछ प्रतिकूल हैं इसीलिये आपको बीमारी सदा घेरे रहती है. यदि आप रविवार के दिन सात जिंदा गरई नस्ल की मछलियां बाजार से खरीद कर वापस नदी में छोड़कर उन्हें जीवनदान दें तो आपकी बीमारी ठीक हो जायेगी.” पंडित जी ने एक उपाय बताया. वह रविवार का ही दिन था. सदानंद बाबू सीधे मछली मार्केट चले गये. “ भैया जरा सात ज़िंदा गरई देना.” एक दुकान पर ज़िंदा मछली देख उन्होंने रुककर कहा. “ बाबूजी यहाँ सात का कौनो हिसाब नहीं है. छोटी मछली है. दरजन से बिकती है. या तो छ: लो या बारह.” मछलीवाले ने सदानंद बाबू को दुविधा में डाल दिया. “ नहीं छ: तो कम पड़ेंगी. ऐसा करो फिर बारह ही दे दो.” बारह मछलियां लेकर वे घर आ गये. सात मछलियाँ एक पॉलीथीन में डालकर वे नदी की तरफ रवाना होने ही वाले थे कि पत्नी की आवाज कान में पड़ी. “ ई बाकी की मछलियन का का करना है जी ?” वे असमंजस में पड़ गये. पंडिज्जी तो सात ही मछलियां नदी में डाले को बोले हैं. अब आ गयी हैं बारह तो….” उन्होंने कुछ देर सोचा. अंत में उन्हें एक उपाय मिल ही गया. “अरे करना का है, बाकी रात में चावल के साथ पका देना. अब ये किस काम की.” संतुष्ट सदानंद ने अपने काम की मछलियाँ उठायीं और उन्हें जीवनदान देने निकल गये.



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